Thursday, 31 October 2013

ग़रीब की दीवाली






ग़रीब की दीवाली

खाने को तेल बमुश्किल मिलता था घर में,
वो पूरे शहर की रोशनी दिखाता था,
चढ़ के पड़ोस की उँची छत पे अपने बच्चो के साथ,
दूसरो के जलाए हूए रॉकेट दिखाता था,
वो ग़रीब हर साल अपनी दीवाली कुछ ऐसे मनाता था...!!!

छन रही थी बगल के घरो जब पूडिया सबके,
उसके पास खिलाने को बस एक रोटी थी,
राम के लौटने में वो भी उतना ही खुश था,
पर लक्ष्मी को खुश करने को उसकी जेब छोटी थी,
बच्चो को राम की कहानी सुना के सुलाता था,
वो ग़रीब हर साल अपनी दीवाली कुछ ऐसे मनाता था...!!!

बच्चे भी उसके बड़े समझदार थे,
जानते थे की उनके बाप ईमानदार थे,
स्कूल जा के सबको झुटि कहानी सुनाते थे,
राते भर पटाखे फोड़े ऐसा बताते थे,
बाप अगली दीवाली के लिए फिर से पैसा बचाता था,
वो ग़रीब हर साल अपनी दीवाली कुछ ऐसे मनाता था...!!! 

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