Friday, 1 November 2013

मूर्ति का चक्कर


मूर्ति का चक्कर 


अक्सर हम अपनी राय अपनी सुविधा के अनुसार बनाते है. कॉंग्रेस का हर नेता अपने आप को स्थापित करने के लिए नेहरू गाँधी परिवार को पकड़े रहता हैं वहाँ ये एक सर्वमान्य परंपरा हैं इसलिए कोई भी स्कीम हो उसका नाम हमेशा नेहरू गाँधी के उपेर ही होगा ये तय है. कॉंग्रेस की इस आदत या बीमारी से कई महान नेता छूट गये तो आज कल जिसको भी अपने आप को राजनीति मैं स्थापित करना होता हैं वो अपनी सुविधा अनुसार किसी बचे खुचे महान नेता को पकड़ लेता हैं. मायावती अपने को CM एवं दलित नेता के रूप स्थापित करना चाहती थी,सो अंबेडकर के नाम पे कई सो करोड़ से एक भव्य पार्क बना दिय.मायावती तो दलित नेता बन गयी पर दलितो का उस पार्क से क्या भला हूआ वो या तो दलित जानते होंगे या मायावती. मोदी भी PM एवं अटल जी की तरह एक सर्वमान्य नेता बनना चाहते हैं सो उन्होने पटेल जी को पकड़ लिया. अब वो कई हज़ार करोड़ से विश्व की सबसे उँची प्रतिमा बनवायंगे,क्यूंकी मोदी की जरूरत बड़ी है सो उनका इनवएस्टेमेंट भी बड़ा होगा.मूर्ति भी बन जाएगी,मोदी PM भी बन जाएँगे. जो ग़रीब हैं वो उस मूर्ति के नीचे खड़े होके अपनी पगड़ी संभालते हूए सोचेंगे की शायद हम विश्‍व मैं सबसे उपर हो गये. जो भला अंबेडकर पार्क से दलितो का हूआ हैं वही भला इस मूर्ति से समाज का होगा या शायद मेरी ही बुद्धि छोटी हैं जो समझ में नही आता ये मूर्ति का चक्कर. कुछ भी हो किसी का भला हो ना हो चिड़ियो का भला ज़रूर होगा उन्हे नयी जगह मिलेगी अपनी थकान मिटाने को ओर बीट करने को. 

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