Thursday, 31 October 2013

ग़रीब की दीवाली






ग़रीब की दीवाली

खाने को तेल बमुश्किल मिलता था घर में,
वो पूरे शहर की रोशनी दिखाता था,
चढ़ के पड़ोस की उँची छत पे अपने बच्चो के साथ,
दूसरो के जलाए हूए रॉकेट दिखाता था,
वो ग़रीब हर साल अपनी दीवाली कुछ ऐसे मनाता था...!!!

छन रही थी बगल के घरो जब पूडिया सबके,
उसके पास खिलाने को बस एक रोटी थी,
राम के लौटने में वो भी उतना ही खुश था,
पर लक्ष्मी को खुश करने को उसकी जेब छोटी थी,
बच्चो को राम की कहानी सुना के सुलाता था,
वो ग़रीब हर साल अपनी दीवाली कुछ ऐसे मनाता था...!!!

बच्चे भी उसके बड़े समझदार थे,
जानते थे की उनके बाप ईमानदार थे,
स्कूल जा के सबको झुटि कहानी सुनाते थे,
राते भर पटाखे फोड़े ऐसा बताते थे,
बाप अगली दीवाली के लिए फिर से पैसा बचाता था,
वो ग़रीब हर साल अपनी दीवाली कुछ ऐसे मनाता था...!!! 

Wednesday, 30 October 2013

अक्सर सोचता हू मे उपर हर धर्म के भगवान केसे रहते होंगे..!!

अक्सर सोचता हू मे हर धर्म के भगवान उपर केसे रहते होंगे,
धरती के इंसानो की तरह क्या  आपस मे झगड़ते होंगे..!!

यहा अपने धर्म को उचा बताने की सब मे होड़ लगी है,इंसान की हालात की किसको पड़ी हे,
ना जाने यहा कितने ही धर्म की रोटिया सेकने वाले ,ना जाने धर्म से कितनो ही की दुनिया उजड़ी पड़ी हे,
चॅड रहे जावारहत यहा पत्थरो पे कितने,दिक्थि  नही की बाहर एक भूखी बुढ़िया खड़ी हैं,
तौल रहे है सब अपने धर्म को यहा पे ,हर धर्म की जमात एक तराजू लिए खड़ी हें,
भगवान भी क्या ऐसा सोचते होंगे ,वो भी को क्या धर्म को तराजुओ में तौलते होंगे 

अक्सर सोचता हू मे हर धर्म के भगवान उपर केसे रहते होंगे,
धरती केइंसानो की तरह क्या  आपस मे झगड़ते होंगे..!!

हर दूसरे दिन रोशनी से मन्दिर/मस्जिद सज जाता है,तभी एक बच्चा बगल की झोपड़ी मे भूक से मर जाता है,
बच्चे की मा को इस बात की खबर नही थी,ग़रीबी से परेशन, एक बाबा को जिस्म बेच रही थी,
 बाबा का शहर में नाम बड़ा था, भोली जनता को भड़काने का उस पे केस चला था ,
उसी शहर मे बाबा का एक दोस्त मौलवी भी था,उसके धरम के लोगो को उस पे विश्वास बड़ा था,
धरम को ख़तरे मे बता के सबको लड़ा रहा था,बाबा के साथ मिल के मौज उड़ा रहा था,
भगवान भी क्या ऐसा सोचते होंगे,सबको लड़ा के क्या सुख भोगते होंगे,

अक्सर सोचता हू मे हर धर्म के भगवान उपर केसे रहते होंगे,
धरती के इंसानो की तरह क्या  आपस मे झगड़ते होंगे..!!

चलो इस बार इन ढोंगियो को धर्म सीखा दें,
दीवाली पे हर ग़रीब के घर एक दीया जला दें,
इस ईद पे ग़रीब को खाना खिला दें,
बहुत बो लिए इन ढोंगियो ने नफ़रत के ये काँटे,चालू प्यार के कुछ फूल उगा दें,
हिंदू मुस्लिम बहुत बन लिए हम अब चलो इंसान बन जाए,इंसानियत को धर्म बना दें,
भगवान भी ऐसा ही सोचते होंगे,इंसानो को लड़ता देख खुद को ही कोसते होंगे.

अक्सर सोचता हू मे हर धर्म के भगवान उपर केसे रहते होंगे,
धरती के इंसानो की तरह क्या  आपस मे झगड़ते होंगे..!!














Thursday, 24 October 2013

सपने



सपने

क्यू अक्सर खामोश तुम हो जाती हो,
वो कौन सी दुनिया है जिसमे खो जाती हो..!!!

आदत है बस तुम्हे चहकते,मुस्कुराते,झुझलाते,चिल्लाते,रोते हूए देखने की,
जनता हू सपने है असीम तुम्हारी आँखो मे,एक अलग संसार है तुम्हारा,
डरता हू इनका टूट जाना कैसा सहोगी तुम, 
मेरा तो बस एक सपना है जिसे मैने देखा था तुम्हारे साथ,
जिसमे बेठी थी तुम मेरे पास हाथ मेरा पकड़े हूए,
बता रही थी कुछ बहुत देर से बहुत ज़ोर ज़ोर से हँस भी रही थी तुम,
याद नही वो बात बस वो चेहरा याद है,खिलखिलाता,हंसता हूआ चेहरा
फिर एक आंशु गिरा था मेरे हाथ पे मैने पूछा तो फिर तुम खामोश हो गयी थी,
शायद फिर कही किसी दुनिया मे खो गयी थी,

क्यू अक्सर खामोश तुम हो जाती हो,
वो कौन सी दुनिया है जिसमे खो जाती हो..!!!

मुझे याद है वो दिन जब हम मिले थे पहली बार,
शर्मा रही थी तुम छुपा रही थी कुछ मुझसे,
कहना चाहती थी बहुत कुछ पर ना जाने क्यू रुक जाती थी तुम किसी डरसे,
फिर बार बार मुझसे मिलने की कोशिशे करती थी ,
मुझे पता था वो कोशिशे किस लिए थी,
याद है मुझे वो दिन जब तुमने अपना वो ख्वाब बताया था,
जिसमे मे था,तुम्हारे साथ तुम्हारे बगल मे चल रहा था,
कंधे पे सिर रख लेती थी तुम जब थक जाती थी,
सोते हूए मुस्करा रही थी आँखे बंद कर के भी तुम,
फिर एकदम से तुम चॉक  उठी थी ,
जैसे कोई ख्वाब टूट गया हू शायद किसी को अपने पास ढूंड रही थी, 
क्यू नही देखा तुमने मुझे मे भी वही पे था,
बगल मे तुम्हारे पास तुम्हे देख रहा था,तुमसे पूँछ रहा था ,
पूछा था कई बार तुमसे मैने क्या हूआ तुम्हे क्यू  ऐसे चॉक गयी हो,
फिर कुछ ना बोलती तुम , मैने पूछा तो फिर तुम खामोश हो गयी थी,
शायद फिर कही किसी दुनिया मे खो गयी थी,

क्यू अक्सर खामोश तुम हो जाती हो,
वो कौन सी दुनिया है जिसमे खो जाती हो..!!!

Saturday, 19 October 2013

भागती दौड़ती ये शहरो की गलिया


भागती दौड़ती ये शहरो की गलिया,गलिया मे बसता है लोगो का मेला,
जाना कहा है कुछ नही है पता,आगे निकालने का है बस रेलाम रेला||

छोटा मे था जब मेरे छोटे थे सपने,छोटी सी दुनिया थी और सब थे अपने,
छोटी सी बतो पे छोटी लड़ाई,लड़ाई के बाद वो रूठना मनाना,
फिर मम्मी का कुछ अच्छा खाना बनाना,खाने की मेजो पे हसना हसाना,
 किचन मे जा के वो बिस्किट चुराना,चुरा के सब से बहाने बनाना.
ये दुनियादारी नही तब थी एसी,छोटे से हम थे और बड़ी थी रहिसी..||

भागती दौड़ती ये शहरो की गलिया,गलिया मे बसता है लोगो का मेला,
जाना कहा है कुछ नही है पता,आगे निकालने का है बस रेलाम रेला||

जब से हम थोड़े से समझदार हो गये है,सारी रहिसी गुम और कंगाल हो गये है,
घर-ऑफीस की भाग दौड़ मे बस पिसे जा रहे है,जीना है इसलिए बस जिए जा रहे है,
सारे सपने फ्लेट,गॅडजेट्स और कारो मे खो गये है,हम खुद से ही कितने दूर हो गये है,
निकले थे घर से तो सपने बड़े थे,अकाउंट मे बस थोड़े पैसे पड़े थे ,
हम पैसे बढ़ाने की ज़िद पे अड़े थे,पलट के देखा तो अकेले खड़े थे.
पता नही कब की थी हँसी और ठिठोली,ज़्यादा खुश हूए तो बस थोड़ी पी ली,
कहे भी तो किससे कौन है काबिल,इन भागती सड़को ने सब की ही ले ली.
सब अपनी उलझनो मे उलझे पड़े है,समझदार होने की सज़ा पा रहे है||

भागती दौड़ती ये शहरो की गलिया,गलिया मे बसता है लोगो का मेला,
जाना कहा है कुछ नही है पता,आगे निकालने का है बस रेलाम रेला||

खबर सारी दुनिया की है पर नही खुद को अपनी खबर है,रोज चलना बिना मंज़िलो के ये कैसा सफ़र है.
$ के रेट की सबको पड़ी है,ब्रॅंडेड कपड़ो की झाड़िया लगी है
इंसान सब कुछ इकट्ठा किए जा रहा है,बस खुद को ही नंगा किए जा रहा है ..
इन सबसे अच्छा था बचपन हमारा,जेबे थी खाली पेर था सबका सहारा,
मुझे मेरे बचपन की याद आ रही है,ये दौड़ती सड़के मुझे खा रही है||

भागती दौड़ती ये शहरो की गलिया,गलिया मे बसता है लोगो का मेला,
जाना कहा है कुछ नही है पता,आगे निकालने का है बस रेलाम रेला||

यू दौड़ दौड़ के मरने से पहले,चलो ऐसा कर ले तोड़ा सा ज़ी ले,
कहा मज़ा है चलने मे अकेले, चलो एक अच्छा सा हम सफ़र तो बना ले,
चलो चल के थोड़ा सा समय अब निकाले,साथ बेठे और जी भर के बाते कर ले,
रोती हे जो माँ याद कर कर के हमको ,चलो उसको एक फोन लगा ले,
भागती दौड़ती इस जिंदगी मे अपनो के लिए कुछ समय तो निकाले..कुछ समय तो निकाले ||