Tuesday, 5 November 2013

मंगल यात्रा मंगलमय हो...!!!






 

मंगल यात्रा मंगलमय हो...!!! 


भारत ने मंगल ग्रह पे पहुचने की दिशा में एक सफल शुरूवात की,हेरानी मुझे इस बात पे नही हूई बल्कि हेरानी इस बात पे है की इस मिशन की कुल लागत केवल 450 cr है, किलोमीटर के हिसाब से देखे तो लगभग12 rs/km  यानी  बेंगलुर के टेक्सी  किराए से भी कम, काश इतने सस्ते ईंधन की तकनीकी ISRO यहा के  टेक्सी वालो को भी दे दे.450 cr रुपये भारत मे इतनी कम राशि है की लगभग इतनी ही कीमत से हमने कॉमनवेल्त की ओपनिंग सेरेमनी की थी,इसके दुगने से ज़्यादा तो मायावती ने अंबेडकर पार्क बनाने मे खर्च कर दी थी इसके पाँच गुने से ज़्यादा मोदी पटेल की मूर्ति खर्च करने मैं लगा देंगे. ये राशि इतनी छोटी है की राजा,कलमाडी,मधु कोड़ा,लालू और इनके जैसे कितने ही नेता तो अकेले ही कितने मंगल अभियान चला सकते है..मुझसे पूछा जाए तो मे तो इसरो के सारे साइंटिस्ट्स को वहाँ से हटा के  वित्त मंत्रालय मैं बिठा दू जब वो इतने कम पैसे पे मार्स मिशन को सफल बना सकते है तो कम से कम प्याज के दाम तो कम कर ही लेंगे और वैसे भी मंगल ग्रह पे यान भेजने के लिए हमारे राहुल गाँधी जी कम टॅलेंटेड थोड़े है.मायावती को तो इसरो पे केस कर देना चाहिए आख़िर इसरो ने एक पार्क की लागत से भी कम लागत मे यान भेज के दलित समाज के लिए बनाए गये पार्क की बेज़्जती तो की ही है.साथ ही साथ मोदी को भी हमेशा की तरह इस बार भी टेकसेवी की अपनी इमेज को बचा के रखनी चाहिए. अब जब मोदी का भी PM बनना लगभग तय ही लग रहा है तब मेरे हिसाब से मोदी को थोड़ा वेट करना चाहिए ओर पटेल की मूर्ति सीधे मंगल ग्रह पे बनवानी चाहिए. मोदी ऐसा कर के एक ग्लोबल लीडर भी बन सकते हैं क्या हूआ की अमेरिका ने मोदी को वीसा नही दिया.मोदी ने अमेरिका  से भी बड़ी मूर्ति मंगल पे बनवा दि. कसम से अपनी बेज़्जती का ऐसा बदला तो अमेरिका सोच भी नही सकता.अमेरिका को ऐसा झटका तो लादेन ने भी नही दिया होगा. 

Friday, 1 November 2013

मूर्ति का चक्कर


मूर्ति का चक्कर 


अक्सर हम अपनी राय अपनी सुविधा के अनुसार बनाते है. कॉंग्रेस का हर नेता अपने आप को स्थापित करने के लिए नेहरू गाँधी परिवार को पकड़े रहता हैं वहाँ ये एक सर्वमान्य परंपरा हैं इसलिए कोई भी स्कीम हो उसका नाम हमेशा नेहरू गाँधी के उपेर ही होगा ये तय है. कॉंग्रेस की इस आदत या बीमारी से कई महान नेता छूट गये तो आज कल जिसको भी अपने आप को राजनीति मैं स्थापित करना होता हैं वो अपनी सुविधा अनुसार किसी बचे खुचे महान नेता को पकड़ लेता हैं. मायावती अपने को CM एवं दलित नेता के रूप स्थापित करना चाहती थी,सो अंबेडकर के नाम पे कई सो करोड़ से एक भव्य पार्क बना दिय.मायावती तो दलित नेता बन गयी पर दलितो का उस पार्क से क्या भला हूआ वो या तो दलित जानते होंगे या मायावती. मोदी भी PM एवं अटल जी की तरह एक सर्वमान्य नेता बनना चाहते हैं सो उन्होने पटेल जी को पकड़ लिया. अब वो कई हज़ार करोड़ से विश्व की सबसे उँची प्रतिमा बनवायंगे,क्यूंकी मोदी की जरूरत बड़ी है सो उनका इनवएस्टेमेंट भी बड़ा होगा.मूर्ति भी बन जाएगी,मोदी PM भी बन जाएँगे. जो ग़रीब हैं वो उस मूर्ति के नीचे खड़े होके अपनी पगड़ी संभालते हूए सोचेंगे की शायद हम विश्‍व मैं सबसे उपर हो गये. जो भला अंबेडकर पार्क से दलितो का हूआ हैं वही भला इस मूर्ति से समाज का होगा या शायद मेरी ही बुद्धि छोटी हैं जो समझ में नही आता ये मूर्ति का चक्कर. कुछ भी हो किसी का भला हो ना हो चिड़ियो का भला ज़रूर होगा उन्हे नयी जगह मिलेगी अपनी थकान मिटाने को ओर बीट करने को.