No One Killed Jan-Lokpal
मेरा नाम,मेरी
टोपी,मेरा गाँव
और मेरा लोकपाल,
सब मेरा ...कुछ
ऐसा ही नज़रिया
है अन्ना जी
का...चुनाव के
कुछ दिन पहले
पांचवा अनशन ,वो भी
केवल 5 दिन चला,कुछ एक
हज़ार लोग,रालेगन
के बाहर ना
कोई आवाज़, ना
कोई जुलूस और
रुलिंग पार्टी से लेकर
विपछ, यहाँ तक
की मायावती,पवार तक
जैसा नेता इसको
पास करने के
लिए ऐसे उतावले
हो रहे है,जैसे लोकपाल
नही उनकी सॅलरी
बढ़ रही हो..लोकपाल पे जीतने
ट्वीट किरण जी
ने 3 साल मैं
न किए होंगे,
उतने केवल 3 दिन
मैं कर चुकी
हैं..और वो
सब लोग जो
कभी भी अन्ना
जी के साथ
नही थे, कुछ
एक आद लोगो
को छोड़ दो
तो वो सब
रालेगन मैं दिख
रहे हैं...एक
ऐसे लोकपाल पे
अन्ना जी तेय्यार
हो चुके हैं
जिनमे उनके खुद
के वो एक
भी पायंट्स नही
जो उनको संसद
ने लिखे के
दिए थे जिसपे
खुद मनमोहन सिंघ
जे ने साइन
किए थे..फिर
क्यू वो उस
पे राज़ी हो
गये..क्यू नही
एक बार भी
उन लोगो से
राय माँगी गयी
जो उस समय
अपना सब कुछ
भूल के अन्ना
जी के साथ
केवल इस उमीद
से लगे थे
की अन्ना जी
झुकेंगे नही...क्या अपना
ईगो इतना बढ़ गया
की उन्हे ये
सब दिखाई हीं
नही पड़ा... ऐसे
लोकपाल को लेकर
तो दलो में
संघर्ष न पहेले
था और न
अब है, लड़ाई
है " लोकपाल का श्रेय
कौन लेगा"...ये
बिल जनलोकपाल नही
लोकपाल का श्रेय
बिल हैं..सब
लगे है श्रेय
लेने मैं अन्ना,किरण जी,
वी के सिंघ,कॉंग्रेस,भाजपा सब..बस देखिएगा
सोमवार के बाद
सब आपस में
लड़ मरेंगे इसी
में... ये ठीक
वैसा ही महासमर
हैं जहाँ पितामह
भीष्म मौन और
गुरु द्रोण ढुर्योधन
के सिँहासन से
सहमत हो चुके
हैं..कभी कभी
सोचकर खीज जाता
हूँ, आखिर अरविन्द
अन्ना को कुछ
क्यूँ नहीं बोलता,
पर फिर सोचता
हूँ , इसी कारण
से तो बाकी
दल वाले वाले
तिलमिला जाते होंगे...सब लोग
अपनी राय का
अधिकार रखते हैं
मैं किसी पे
अपनी राय नही
थोपना चाहता पर
एक बात बिल्कुल
समझ नही आती
क्यू कई लोग
ऐसे हैं जो
अरविंद को मायावती,पवार,मुलायम
जैसे सरीखे नेताओ
से ज़्यादा ख़तरनाक
मानते हैं इतनी
शिद्दत से मैने
ऐसे लोगो से
कभी भी इन
नेताओ के बारे
मैं इतनी बुरी
बाते नही सुनी
जितनी की अरविंद
के बारे मैं
ये करते हैं
जैसे आज तक
के सारे घोटालो
मैं अरविंद का
ही हाथ हैं
क्यू ऐसा हैं
की सब गिद्ध
जैसे एकदम डटे
हैं
कब मौका मिले
और टूट पड़े
उस पे...सारे
ईमानदारी के प्रमाण
पत्र उसी से
क्यू माँगे जा
रहे हैं क्यू
नही कोई बाकी
नेताओ से प्रश्न
पूछता हैं..क्यू
हम हमेशा जो
भी व्यवस्था के
खिलाफ आवाज़ उठाता
हैं उसके पीछे
पड़ जाते हैं की
उसने ऐसी जुर्रत
की कैसे?? इतना
दबा दो उसे
की आगे से
कोई ऐसी जुर्रत
ना कर पाए..और अरविंद
एक ऐसा ढीठ
हैं जा खड़ा
हैं अकेले बिना
झुके, बिना रुके
कब तक पता
नही..!!!!

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